Thursday, October 1, 2020

Diregard of oath in India-Prof Sudhakar Dixit

 अखबारों में जैसा पढ़ने को मिल रहा है उसके अनुसार मुझे ऐसा लगता है कि जिनके हाथ मंे षासन की बागडोर है ऐसे उंचे से उंचे पदों पर बैठे हुए लोग भी जैसी षपथ लेकर अपने पदों पर बैठे हैं उसका ध्यान अधिकतर नहीं रख रहे हैं। आजकल की परिभाशा में जो लोग बड़े माने जा रहे हैं जब उनकी यह स्थिति है तो जनसामान्य यदि अपने षपथ से मुकर रहा है तो इसमें कोई आष्चर्य नहीं होना चाहिए।

   मानवता का तकाजा यह है कि किसी भी तरह के उत्तरदायित्व को वहन करते समय जो षर्तें हमें षपथ के रूप में स्वीकार करायी जायें उनकी किसी भी स्थिति में उपेक्षा न की जाय तभी व्यक्ति से लेकर समाज एवं राश्ट्र तक का मर्यादा के साथ निरंतर प्रगति की ओर बढ़ना संभव हो सकता है।

  प्रायः हम सभी लोग यह कहा करते हैं कि कभी भारत एक आदर्ष षिक्षक के रूप में जगद्गुरू था और भौतिक समृद्धि की दृश्टि से भी सोने की चिड़िया माना जाता था। क्या हमने सोचा है कि ऐसा क्यों था ? ऐसा इसलिए था कि भारत देष के मनुश्य ही नहीं पषु पक्षी भी अपने वचन का पालन करने के लिए अपने प्राणों तक की बाजी लगा देते थे, पर आज हम ठीक इसके विपरीत यह देख रहे हैं कि चंद पैसों के लिए हम अपने आर्दष की उपेक्षा करने में तनिक भी देर नहीं लगाते हैं। इसी कारण हर एक संबन्ध चाहे वह व्यक्ति के स्तर पर हो, समाज के स्तर हो या राश्ट्र के स्तर पर हो, अविष्वास के गर्त में गिरता जा रहा है और इसी का दुश्परिणाम सर्वत्र दुराचार, अनाचार की बढोत्तरी है।

  हमारे आज के राश्ट्र षासक यह तो एक मत से स्वीकार करते हैं कि संसद सर्वोच्च है उसका निर्णय ही सर्व मान्य निर्णय हो सकता है पर क्या इस पर भी विचार किया जाता है कि संसद की सदस्यता ग्रहण करते समय जो षपथ दिलायी जाती है उसका तहे दिल से हम पालन करते हैं या नहीं और जनसामान्य हमारे प्रति तहे दिल से आस्था रखता है या नहीं ?

  क्या यह वास्तविकता नहीं है कि आज जिस किसी भी तरह से सत्ता अपने हाथ में ही रहनी चाहिए, एक मात्र यही लक्ष्य मानकर केंद्र या प्रांतों में षासकीय स्तर पर सारी गतिविधियां चल रही हैं। किसी मंत्री का यदि किसी ने किसी रूप मंे अपमान किया तो उसकी निंदा सर्वसम्मति से की जाती है और यह उचित भी है पर निंदा करते समय इस बात पर विचार करने की जहमत नहीं उठाई जाती कि आखिर इस प्रकार का अपमान करने का भाव एक सामान्य आदमी में क्यों उठ रहा है और इसके निराकरण के लिए क्या करना चाहिए।

जब अपनी सरकार के जाने का समय अत्यंत नजदीक है तब चंद मिनटों के लिए विधानसभा बुलाकर प्रांत को चार भागों में बांटने का प्रस्ताव ऐसे पारित कर दिया जाता है मानो चुटकी बजाकर चार राज्य बिना किसी समस्या के बन जायेंगे और जनता पर कोई आर्थिक भार भी नहीं पड़ेगा।

  चंूकि यह मान लिया गया है कि हमारा बहुमत है और जनसामान्य को प्रलोभन देकर अपने हाथों में ही सत्ता सुरक्षित कर लेने का भाव है बस इसीलिए यह सबकुछ हो रहा है। वास्तव में सामान्य जन के हित की बात सोची जा रही है या नहीं यह स्वयं स्पश्ट है!

  यह सब देखते हुए यदि यह विचार एक निश्पक्ष व्यक्ति का बन रहा हो कि आज के षासक देष की रक्षा के नाम पर केवल अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं तो यह संभवतः अनुचित नहीं होगा।

   भ्रश्टाचार से सब लोग त्रस्त हैं लेकिन भ्रश्टाचार के विरोध में कोई आवाज उठा रहा है तो हर संभव उपाय से उसकी आवाज को कुचल देने की कुचेश्टा यदि आज के षासक कर रहे हैं तो क्या इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि अब हमारे देष के षासक देष के रक्षक नहीं अपितु भक्षक हो गये हैं?

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