Saturday, October 17, 2020

भारत मे बाल विवाह और यौन अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी को कैसे रोकें ?

यह स्पष्ट है कि यह कानून बाल विवाह (खासकर लड़कियों के लिए) पर अच्छी रोक लगाता है- दोनों ही तरफ के अभिभावकों को चेताता है कि यदि वे इस तरह के विवाह करवाते हैं तो उन्हें नतीजा भोगना पड़ेगा। इसके अलावा इस रोक से लड़कियों को शिक्षा से वंचित नहीं होना पड़ेगा, उनका विवाह कम-से-कम 18 वर्ष की उम्र में होगा, जिससे उनका शारीरिक, मानसिक उत्पीड़न रुकेगा। कम उम्र में विवाह, बच्चे लड़कियों के जीवन से खेलने जैसा है और ऐसा होने पर न तो उनका सशक्तिकरण हो सकता है और न ही विकास। इस दिशा में यह एक बड़ा कदम है।

भारत में, बच्चों पर यौन अपराधों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में, काफी बढ़ोत्तरी हुई है। पहले के कानून में बालिग और बच्चों, पर अपराध में कोई खास अन्तर नहीं था। न तो बारिकी से छोटे-बड़े अपराधों का फर्क किया जाता था और न ही बच्चों के मामलों में काफी सख्त सजा का प्रावधान था। यौन छेड़-छाड़ के सभी मामले एक ‘जेनरल’ भारतीय दंड संहिता की धारा-354 में आते थे और उसकी सजा अधिकतम 2 वर्ष थी। अपराध जमानतीय था और शायद ही अधिकतम सजा अपराधी को मिलती थी। हरियाणा के डी.जी.पी. राठौर के मामले में रुचिका गहरोत्रा को जिस तरह न्याय न पाने पर जान तक देनी पड़ी, वह सर्वविदित है। एक ही तरह के अपराध में बालिगांे की अपेक्षा बच्चों के मन में यह अपराध जिस तरह का असर डालता है, वह उनका बचपन, जवानी, सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। अपराधी भी कम सजा, क्रम रिपोर्टिंग का लाभ उठाकर बच्चों को आसान शिकार समझते हैं। बलात्कार की पुरानी परिभाषा भी बच्चों के मुकदमों को कमजोर करती थी। मानव-अंग के प्रयोग के अलावा जिन वस्तुओं का प्रयोग यौन उत्पीड़न में होता है-उन्हें भी बलात्कार की व्याख्या में शामिल करने की मांग लंबे समय से हो रही थी। इन सबको ध्यान में रख कर अब किसी भी प्रकार का यौन उत्पीड़न ‘बलात्कार’ में शामिल किया गया है। बच्चों के लिए अब अलग से ‘‘यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा कानून, 2012’’ लाया गया है।

इस कानून के अनुसार बच्चों से किसी भी प्रकार की यौन छेड़-छाड़ किसी के भी द्वारा, उनका यौन शोषण के लिए व्यापार या उनकी पोर्नोग्राफी गंभीर अपराध है, जिसकी सजाएं पहले से काफी ज्यादा है। तीन वर्ष सश्रम कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक। इस कानून के अनुसार पुलिस परिसर में पुलिस द्वारा, आर्मड फोर्सेस, सिक्युरिटी फोर्सेस के परिसर में या कहीं ओर फोर्सेस के द्वारा, किसी पब्लिक आॅफिसर द्वारा, जेल के स्टाफ या मैनेजमेंट द्वारा, रिमाण्ड होम, प्रोटेक्षन होम, आॅब्जरवेशन होम में रह रहे बच्चे के साथ स्टाफ या मैनेजमेंट के लोगों द्वारा, सरकारी या गैर-सरकारी अस्पताल के स्टाफ या मैनेजमेंट के लोगों द्वारा या शैक्षणिक संस्थान तथा धार्मिक संस्थान के लोगों द्वारा बच्चे का यौन शोषण गंभीर अपराध है।

इस कानून में पहली बार धार्मिक संस्थान में हो रहे या होने वाले बाल यौन शोषण की बात की गई है। 2013 में एक धार्मिक संस्थान के व्यवस्थापक के विरुद्ध, इस कानून के अन्तर्गत की गई कार्यवाही ने पूरे देश में सनसनी पैदा कर दी है। बच्चे वैसे भी शारीरिक, मानसिक तौर पर कमजोर तथा निरीह होते हैं। उन्हें बहलाकर, फुसलाकर, लालच देकर अपने वश में करना आसान होता है। वे नहीं जानते वे क्या कर रहे हैं, उनके साथ क्या हो रहा है, पर ऐसे शोषण के कुपरिणाम उन्हें जीवन भर भोगने पड़ते हैं। उनकी कम समझ और लाचारी को देखते हुए इस कानून में यह प्रावधान भी लाया गया है कि किसी मीडिया, होटल, लाॅज़, हाॅस्पिटल, क्लब, स्टूडियो-फोटोग्राफिक फैसिलिटी वाली जगहों में काम करने वालों की यह जिम्मेदारी है कि वे जहां भी बाल यौन शोषण के चिह्न पाऐं फौरन पुलिस या स्पेशल जुवेनाईल पुलिस युनिट को खबर कर बच्चे की रक्षा के लिए कदम उठाएं। ऐसा न करने पर छः महीने तक सजा भी हो सकती है।

इसी प्रकार 16 दिसम्बर 2012 को ‘निर्मया’ का सामूहिक बलात्कार होने के बाद भारत में एक जन आन्दोलन उमड़ने के बाद ‘वर्मा कमिटी’ ने बलात्कार तथा अन्य अपराधों की संख्या में बेतहाशा बढोतरी के कारण और निदान का अध्ययन किया। इस कमिटि ने रेकाॅर्ड समय में ‘क्रिमिनल लाॅ (एमेन्डमेण्ट)एक्ट, 2013 बनाया, जो 2 अप्रैल, 2013 को आ गया। इस कानून ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872, भारतीय दंड संहिता तथा ‘यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा, 2012 में महत्वपूर्ण संशोधन किए।

भारतीय दंड संहिता की धारा 100 में सातवां क्लाॅज जोड़ा गया, जिसमें जानबूझकर किसी पर तेजाब फेंकना तथा तेजाब फेंकने या पिलाने का प्रयास करना, जिससे गंभीर चोट पहुंचने का खतरा हो, जोड़ा गया। सजा बढ़ाई गई। भा. दं. स. की धारा 166 में धारा 166 ए तथा 166-बी भी जोड़े गए। महिलाओं से संबंधित अपराधों में पुलिस द्वारा एफ. आई. आर. न रिकाॅर्ड करने पर पुलिस अधिकारी को दो वर्ष तक की सजा का प्रावधान लाया गया। पीड़िता का इलाज न करवाने की सजा पुलिस अधिकारी के लिए 1 वर्ष कारावास की गई। भा. दं. सं. की धारा 354 (अश्लील छेड़-छाड़) की सजा बढ़ा कर 3 वर्ष की गई। साथ ही अश्लील छेड़-छाड़ की परिभाषा में बदलाव किया गया। पहले की तरह, किसी भी किस्म की छेड़-छाड-़यौन हमले इसमें नहीं रहे बल्कि शारीरिक काॅन्टैक्ट या ऐसे पास आने की कोशिश, जो अस्वीकार्य है-काफी स्पष्ट है, इन्हीं तक सीमित किया गया। इसके अलावा इसमें यौनेच्छा जाहिर करना, महिला की इच्छा के विरुद्ध पोर्नोग्राफी दिखाना या द्विअर्थी शब्दों, जिसमें यौनिक भाषा का इस्तेमाल है, को अपराध माना गया। इसके अलावा ‘स्टाकिंग’ लगातार पीछा करना, ‘वोयेरिज्म’-स्त्री को उसके एकान्त स्थल में बिना कपड़ों के देखने की कोशिश, उसकी इस अवस्था में फोटो खींचना आदि भी जोड़े गए। इसमें भी सजा को तीन वर्ष से 5 वर्ष तक का प्रावधान जोड़ा गया।

बलात्कार’ की परिभाषा बदली गई। ताउम्र जेल में रहने की सजा दी गई है। पर आश्चर्य की बात यह है कि जितना इलाज किया गया, मर्ज बढ़ता ही गया। निर्मया के मामले के बाद लगता था कि लोग स्त्रियों के प्रति इस घिनौनी हरकत से बाज आएंगे, कड़े कानूनों का उन पर असर होगा, पर हुआ उलटा ही। स्त्रियों पर ऐसे अपराधों की संख्या कई-कई गुना बढ़ गई। बच्चियों को भी नहीं बख्शा गया। और तो और, नाबालिग अपराधियों ने भी इस तरह के अपराधों से खुद को दूर नहीं किया। वास्तव में कड़े कानूनी प्रावधान अपराधियों का मनोबल नहीं गिराते। जब तक लाॅ इन्फोर्सिंग ऐजेन्सीज-पुलिस, ‘प्रासिक्यूशन’ तथा न्यायपालिका अपना कर्तव्य सफलतापूर्वक नहीं निभाती-स्त्रियों की सुरक्षा नहीं हो सकती। ‘कन्विक्शन रेट’ इन मामलों में 24 प्रतिशत से कम है तथा अभियुक्तों की रिहाई 76 प्रतिशत है। एफ. आई. आर. होने में देरी, आधा-अधूरा एफ. आई. आर. दर्ज होना, मामले की जांच में बहुत सारी खामियों का होना, फैसला आने में काफी देर होना, गवाहों का देरी के कारण अपने बयान से पलटना, उन्हें अपराधियों द्वारा धमकाया जाना, उनकी सुरक्षा का इंतजाम न होना, स्त्रियों के साथ एक तरह की लापरवाही बरतना, उनके प्रति पूर्वाग्रहों से भरा होना आदि-आदि के कारण हैं, जिनकी वजह से अपराधियों को अपने जीत जाने का पूरा विश्वास हो जाता है।

कानून में अनेक प्रगतिशील तथा आवश्यक सुधारों के समावेश होने के बावजूद व्यवहारिकता में पुलिस, अदालत द्वारा उन उपायों की अनदेखी करना भी स्त्रियों के प्रति अन्याय है। जैसे हाल ही में मुंबई में हुए शक्तिमील के सामूहिक बलात्कार की शिकार लड़की को अनावश्यक रूप से वे पोर्नाेग्राफी क्लिप्स कोर्ट में दिखाए गए, जिन्हें अपराधियों ने उसे बलात्कार के पहले देखने के लिए मजबूर किया था। नतीजा वही निकला जिसकी आशा थी। लड़की वहीं बेहोश हो गई। क्या इन क्लिप्स को दिखाना जरूरी था अपने ऊपर हुए बलात्कार को साबित करने के लिए? बिल्कुल नहीं, फिर ऐसा क्यों हुआ और किस कानून के अन्तर्गत। इसके अलावा उसको अदालत बुलाने की जरूरत भी नहीं थी। वीडियो काॅन्फ्रेसिंग से उसका बयान लिया जा सकता था। यह सब कहीं ‘परवर्स प्लेजर’ के लिए तो नहीं था।

जिस तरह बाल पीड़ितों के अभियुक्त के सामने नहीं लाया जाता, वैसा ही कुछ बालिग पीड़ितों के लिए भी किया जाना चाहिए। कार्यस्थल पर हुए पीड़ितों को भी अभियुक्तों के सामने करने की इजाजत नहीं है। वास्तव में यही तरीका हर प्रकार की यौन पीड़ितों के साथ करने की जरूरत है। यह सचमुच एक दुःखद स्थिति है कि घर से लेकर, समाज, पुलिस, अदालतें एक सुर में दोहराते पाए जाते हैं कि लड़की को रात में नहीं निकलना चाहिए, मित्र के साथ नहीं होना चाहिए, पर्याप्त कपड़े पहनने चाहिए, आदि-आदि। यही ‘माइण्डसेट’ हर जगह काम करता है-जिसका नतीजा है महिलाओं का पढ़ना-लिखना, बाहर काम करना-डर से भरा होता है।

जिस रफ्तार से महिलाओं के सशक्तिकरण, उनके विकास के लिए कानून बने हैं, लगता है भारत में महिलाओं की हर तरह की सुविधा-सुरक्षा प्राप्त है। वे महिलाएं, जिनका सशक्तिकरण तथा विकास हुआ है, वे पहले से ही ऐसी जगहों से आती हैं जहां मुश्किलें कम हैं, सुविधाएं अधिक हैं, पर बात उन स्त्रियों की है जो मध्यम या निम्न वर्ग से हैं। वे अथक प्रयास कर रही हैं शिक्षा प्राप्त करने की, बाहर नौकरी कर खुद अपने पांवों पर खड़े होने की, पर उनका मनोबल तोड़ने के पूरे तंत्र तैयार है। उनकी आधी शक्ति खुद को सुरक्षित रखने में चली जाती है। कुछ कर भी जाती हैं तो निर्मया की तरह, शक्तिनगर मिल की पीड़िता की तरह जान दे देती है, फिर खड़े होने की कोशिश करती है। चेन्नई की विनोधिनी की तरह तेजाब से जला दी जाती है, जिन्हें अन्ततः मरना पड़ता है। बलात्कार, ईव टीजिंग, दहेज-हत्या, तेजाब फेंकने की घटनाएं और न जाने कितने तरह के अत्याचार, समाज व्यवस्था का पूर्वाग्रह उनके विकास और सशक्तिकरण में बेड़ियों की तरह काम करती है।

कहना न होगा महिला सशक्तिकरण तथा विकास का अर्थ अलग-अलग वर्गाें की स्त्रियों के लिए अलग-अलग है। भारत में इन वर्गाें की संख्या सैकड़ों में है। प्रथम वर्ग में महिला राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, न्यायाधीश, वकील, चिकित्सक है तो अंतिम वर्ग में वह एक ‘डायन’ घोषित हो जाती हैं, जहां उसके बाल काट कर, निर्वस्त्र कर गलियों में घुमाया जाता है, पीटते-पीटते मार दिया जाता है। (लाहौर दंगा रांची का एक मामला- 5-11-13): किसी वर्ग में बेटी का अपनी इच्छा से विवाह कर पति के घर जाना इतना बड़ा मामला बन सकता है कि पिता-उसका मित्र ही, बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार कर मौत के घाट उतार देते हैं (5ः11ः2013), पूरे देश में गरीब लड़कियों की खरीद-बिक्री महज 5-10 हजार रुपयों में हो रही है, जिनमें आदिवासी, बंगाली, बिहारी, उड़िया लड़कियाँ बहुतायत में हंै। वे लड़कियाँ घरेलू काम, यौन हिंसा, शारीरिक हिंसा का शिकार होती हैं, बहुत कम मामलों में उन्हें बचाने की कोशिश होती है।

गरीब भारतीय महिलाओं को ‘सरोगेसी’ माँ भी बनना पड़ता है। यह अब एक व्यापार हो गया है, जिसका आकार-प्रकार काफी विस्तृत है। यह सब स्त्रियों का सशक्तिकरण या विकास तो हर्गिज नहीं है। असल में, नारी का सशक्तिकरण तथा विकास तब होगा, जब इसकी पहुंच हर जगह हो-हर वर्ग के पास हो, वह सुरक्षित रहकर पुरुष के समान बिना किसी हिचक के अपनी उन्नति कर पाए।


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