Saturday, October 3, 2020

वुहान के संस्मरण

वुहान के संस्मरण

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं चीन के राष्ट्रपति झी जिनपिंग के बीच वुहान में हुए भारत-चीन अनौपचारिक षिखर सम्मेलन को एक वर्ष बीत चुका है। चीन में भारत के पूर्व राजदूत गौतम बम्बावाले इस पर चर्चा कर रहे हैं कि इस सम्मेलन के बाद किस प्रकार से दोनों देषों के रिष्तों में सद्भावना रही


चीन के वुहान स्थित पूर्वी -हजयील में 28 अप्रैल, 2018 को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं चीन के राश्ट्रपति -हजयी जिंपिंग नौका विहार करते हुए

भारत के प्रधानमंत्री एवं चीन के राश्ट्रपति के बीच हुआ वुहान अनौपचारिक षिखर सम्मेलन इस दृश्टि से भी अहम रहा क्योंकि दोनों नेताओं के मध्य ‘‘रणनीतिक संचार’’ हुआ था। इस दौरान दोनों नेताओं ने एक दूसरे के दृश्टिकोण, सपनों, लक्ष्यों, आकलनों एवं रणनीति के बारे में जाना तथा उन्हें भली-भांति समझा। इसका आरंभ एक दूसरे की सभ्यतागत नैतिकता, मानदंडों एवं परंपराओं से हुआ जिनमें वर्तमान समय में बदलाव देखने को मिल रहा है। दोनों नेताओं ने एक दूसरे की उम्मीदों, महŸवाकांक्षाओं एवं दोनों देषों के लोगों की इच्छाओं पर चर्चा की। इससे अन्य घरेलू एवं विदेषी नीतियों को भी समझने में मदद मिली। भू-अर्थषास्त्र एवं भू-राजनीतिक पर भी चर्चा की गई। दोनों नेताओं ने इस बात पर भी विचार किया कि किस प्रकार से वे मिलकर कार्य कर सकते हैं। जिन मुद्दों पर दोनों देषों में मतभेद हैं अथवा विवाद हैं, उन्हें किस प्रकार से दूर किया जा सकता है। ऐसा होने पर दोनों देष आपसी सहमति से कार्य कर सकेंगे जिससे दोनों देषों के रिष्तों में मज़बूती आएगी। यह एक ऐसा स्पश्ट, बेबाक एवं प्रत्यक्ष रूप से विचारों का आदान-प्रदान था जिससे अधिक निश्पक्षता संभवतः कभी न हो पाती। इस बैठक में दोनों नेताओं ने अपने विचार एक दूसरे के समक्ष रखे और वह भी बिना पढ़े हुए। अर्थात् उनके दिल में जो था उन्होंने साफ़गोई से उसे अभिव्यक्त कर दिया था। अनौपचारिक बैठक की अधिक जवाबदेही बनती है कि उससे दोनों पक्षों के विचार एवं विष्वास से अवगत हुआ जा सकता है। अतः, राश्ट्रपति झी एवं प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इस औपचारिक बैठक का आयोजन करके एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया था।

भारत व चीन के मध्य हुआ वुहान अनौपचारिक षिखर सम्मेलन सफल रहा। एक वर्श बीत जाने के पष्चात भी दोनों देषों के बीच आपसी रिष्ते अपेक्षाकृत सुदृढ़ रहे हैं। इसका महŸव इसकी सफलता में ही निहित रहा है। भारत-चीन के आपसी रिष्तों में पहले की ही भांति सद्भावना बनी हुई है। इसका श्रेय चीन के राश्ट्रपति झी एवं भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी को जाता है।

आख़िर वुहान अनौपचारिक षिखर सम्मेलन का परिणाम क्या रहा? पहला परिणाम तो यह रहा कि दोनों देषों के मंत्रिमंडल की बैठकें जारी रहीं। भारत की विदेष मंत्री श्रीमती सुशमा स्वराज एवं रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने 2018 में चीन की यात्रा की तथा चीन के रक्षा मंत्री वेई फें़गहे, सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री झाओ केझी एवं विदेष मंत्री वांग यी भारत आए थे। यद्यपि हमारे नेता मुख्य रूप से चीन में आयोजित होने वाले द्दाांघाई सहयोग संगठन एससीओ में ही हिस्सा लेने गए थे, बावजूद इसके दोनों पक्षों ने आपसी मुद्दों पर भी चर्चा की। वास्तव में, वुहान षिखर सम्मेलन की औपचारिक घोशणा श्रीमती सुशमा स्वराज एवं चीन के विदेष मंत्री वांग यी ने की थी। उन्होंने यह घोशणा पेइचिंग में द्विपक्षीय वार्ता के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान की थी। भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने भी चीन के रक्षा मंत्री के साथ अहम बैठक की थी। इसका परिणाम यह निकला कि दोनों देष रक्षा एवं सैन्य सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए।

चीन के सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री ने भारत की यात्रा की तथा गृह मंत्री राजनाथ सिंह से वार्ता की। दोनों नेताओं ने भारत व चीन के बीच कानून स्थापना, आतंकवाद का सामना एवं गुप्त सूचनाओं का आदान-प्रदान करने जैसे क्षेत्रों में सहयोग का नया मंच तैयार किया। इससे स्पश्ट संकेत गया कि आने वाले वर्श में इसका महŸव देखने को मिलेगा। दिसम्बर, 2018 में भारत एवं चीन के विदेद्दा मंत्रियों ने पहली उच्च-स्तरीय बैठक की थी। इसमें लोगों को लोगों से मिलने के अवसर प्रदान करने पर बल दिया गया। इस मुद्दे को हमारे द्विपक्षीय संबंधों में सबसे कमज़ोर कड़ी माना गया। उचित राजनीतिक एवं आर्थिक सहयोग के बल पर एक दूसरे के नागरिकों को आने-जाने का सुअवसर प्राप्त हो सकेगा।

दूसरा परिणाम यह निकला कि सैन्य बल के द्दाीर्श अधिकारियों ने भी एक दूसरे से मुलाकात की। पूर्वी सेना कमांड एवं चीन के पष्चिमी थिएटर कमांड ने एक दूसरे से मुलाकात की। तभी से कमांडरांे एवं सैनिकों के बीच एक दूसरे से मिलने एवं उनकी कार्यषैली को समझने का मौका मिला। सैनिक एवं अधिकारी हमारी सीमाओं के प्रमुख प्रहरी हैं। आपस में मिलने से उन्हें ज़मीनी हकीकत की जानकारी मिली। इससे भी अधिक महŸवपूर्ण बात यह रही कि दोनों देषों की नौसेना के बीच सहयोग बढ़ाने पर बल दिया गया। अप्रैल में चीन में आयोजित अंतरराश्ट्रीय जलपोत प्रदर्षनी में हिस्सा लेने भारतीय नौसेना के दो जलपोत किंगदाओ पहुंचे थे।

तीसरा परिणाम यह निकला कि जहां भारत का चीन से कारोबारी घाटा सिकुड़ता जा रहा है, वहीं व्यापार के क्षेत्र में व्यापकता देखने को मिल रही है। हालांकि, भारत के फार्मा उत्पादों एवं साॅफ़्टवेयर का निर्यात बढ़ाने पर विोश बल दिया जा रहा है। अगर हम ये उत्पाद चीन में बेचने में सफल रहे तभी कारोबार में हो रहे घाटे को कम किया जा सकता है। व्यापार में जारी असंतुलन को दूर करने के लिए भारत को चाहिए कि अधिक से अधिक चीनी पर्यटक भारत आएं। साथ ही चीनी कंपनियां हमारे देष में ग्रीनफील्ड उपक्रमों में निवेष करें। चैथा परिणाम यह निकला कि वुहान अनौपचारिक सम्मेलन से यह स्पश्ट हुआ कि दोनों देषों की सीमाओं पर षांति से ही दोनों पक्षों का भला होगा। इन गर्मियों में भारत-चीन की सीमाओं पर षांति बरकरार रही। यह राश्ट्रपति झी एवं प्रधानमंत्री श्री मंत्री की आपसी समझ का ही प्रभाव था। इससे भारत अपने आंतरिक मामलों विषेशकर आम चुनावों पर ध्यान दे सका था। पांचवां, परिणाम यह निकला भारत-चीन ने इस बात के लिए हाथ मिलाया कि वे अफ़गान राजनयिकों को प्रषिक्षित करेंगे ताकि एद्दिाया वह यह देष भी उन्नति कर सके। वहां पर स्थिरता कायम हो सके। अंततः, भारत एससीओ का एक सक्रिय सदस्य बन गया। वह इस संगठन की सभी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगा है। इसके अलावा संयुक्त सैन्य अभ्यास भी करने लगा है। इस तरह के सहयोग से भारत को मध्य एषियाई क्षेत्र में महŸवपूर्ण साझेदार मिलते हैं।

अब भारत व चीन के नेताओं के बीच दूसरा अनौपचारिक सम्मेलन इस वर्श कब होना है, इसका निर्णय दोनों पक्षों को ही करना है। अब यह सम्मेलन जब भी हो, अधिकांष पर्यवेक्षकों को ऐसा प्रतीत होता है कि नेतृत्व स्तर की बैठकों के लिए ‘‘अनौपचारिक षिखर सम्मेलन‘‘ एक स्थाई विकल्प के रूप में टिकने वाला है।

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