Saturday, October 17, 2020

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग से सम्बंधित विषयों पर अधिकार

 राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग से सम्बंधित विषयों पर अधिकार 

इन महिलाओं का शरीर मानो इनका न होकर पराया हो गया है। इस भ्रूण में न पति के शुक्राणु व न ही अंडा होता है। इस प्रकार उत्पन्न बच्चे से उसका कोई सीधा आनुवांशिक सम्बन्ध नहीं होता है। बच्चे को जन्म देने वाली ऐसी माता का बच्चे पर कोई कानूनी अधिकार भी नही होता। दास-प्रथा के जमाने में भी इसी प्रकार जन्मदात्री का शिशु पर कोई अधिकार नहीं होता था। कई बार उक्त महिलाएं बच्चा देने के बाद भावनात्मक समस्या से उत्नन्न मानसिक रोगों का शिकार हो जाती है। गर्भपात हो गया तो हाथ खाली रह जाता है। वकील का खर्चा उठाना, इनके बूते से बाहर है। ऐसी स्थिति में ये ठगी की ठगी रह जाती है। प्रसव के पश्चात् इन महिलाओं के पतियों का व्यवहार बदलने से इनकी स्थिति दयनीय हो जाती है तथा परित्यक्ता का जीवन जीने को बाध्य होना पड़ सकता है। किराए की कोख से उत्पन्न बच्चों की स्थिति पर भी ध्यान देना अति आवश्यक है। भारत के योजना आयोग ने विगत में सम्बंधित मंत्रालयों, विभागों एंव राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के साथ बैठक करके इस विषय पर व्यापक चर्चा एवं विचार-विमर्श किया है। इसमें बच्चे को जन्म देने वाली माँ के स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिकारों, भ्रूण-चयन, बच्चों की नागरिकता से सम्बंधित विषयों पर चिंता प्रकट की गई है। बच्चे के अधिकारों की इस समूची प्रक्रिया में अनदेखी आज भी हो रही है। आज इस समूचे परिदृय को हमें महिला अधिकारों के दृष्टिकोण से भी देखना होगा। पश्चिमी पृष्ठभूमि की ओर जब हम ध्यान देते होते है, तो पाते है कि गर्भपात का कानून ही 1975 में अस्तित्व में आया। यूरोप में इटली से महिलाएं हवाई जहाज से यात्रा करके ब्रिटेन या हाॅलैंड गर्भपात हेतु जाती थी। कालान्तर में गर्भपात एवं गर्भ-निरोध सम्बन्धी पहलू प्रजनन अधिकारों का अंग बन गए है। बीजिंग सम्मेलन में पहली बार महिलाओं के अधिकार और मानव अधिकार पर पुरजोर बहस हुई। महिलाओं के प्रजनन के अधिकार ने कब, कैसे, कितने बच्चों को जन्म देना है, या देना भी है या नहीं को इसे विश्वपटल पर मान्यता मिली।

इसी क्रम में यह प्रश्न मुखरता के साथ उठा कि, क्या मातृत्व को जैविक परिभाषा की सीमा में बाँधा जा सकता है? क्या गोद लेने वाली महिला माँ नहीं होती? ब्रिटेन, अमेरिका, कनाड़ा, जापान में कानूनों में विभिन्नता तो है, परन्तु वाणिज्यिक रूप में किराये की कोख लेना प्रतिबंधित है। सऊदी अरब व चीन में भी यही स्थिति है, परन्तु चीन में प्रतिबन्ध के बाद भी इस क्षेत्र में चोरी-छिपे कालाबाजारी पनपती जा रही है। यदि हम यूरोप की बात करें तो, रूसी-गणराज्य में यह वैध है, परन्तु यूक्रेन में मात्र वैवाहिक लोगों के लिए वैध है। आॅस्ट्रेलिया में यह एक कानूनी अपराध है। भारत मंे प्रभावी कानून के अभाव में विदेशी लोगों ने जैविक उपनिवेशवाद को स्थापित कर लिया है। किराये की कोख से उत्पन्न विषय अपने आप में जटिल ही नहीं अपितु विरोधाभासी भी है। इसकी धुरी का केन्द्र बिंदु पैसा और मात्र पैसा ही है। इसकी नैतिकता पर प्रश्नचिन्ह आम जनता ही नहीं, अपितु धार्मिक संस्थाएं व सरकारें भी प्रश्नचिह्न लगाती है। प्रसव की क्रिया मानो एक नौकरी के जैसी हो गयी है, तथा बच्चा मानो एक उत्पाद होकर ही रह गया है। जैसे किसी वस्तु का क्रय-विक्रय करते समय शर्ते रखी जाती है, कमोबेश यह प्रक्रिया भी इसी बाजारी हिस्से के समकक्ष हो गयी है।

भारत में गरीबी के कारण किराये की कोख देने को तत्पर महिलाएं बहुतायत से उपलब्ध है। ऐसी महिलाएं प्रायः समाज के नीचे के तबके/वर्ग की होती हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय होती है। समाज में अपनी इज्जत या साख बचाने हेतु प्रायः गुप्त रूप से अपनी कोख किराये पर देती है। ऐसी महिलाओं की स्थिति अत्यन्त पीड़ादायक हो जाती है, जब जन्म के बाद बच्चे के जैविक माता-पिता कतिपय कारणों से बच्चा लेने नहीं आते व अपने बच्चों के साथ इसे पालना उनके लिए संभव नही होता। बच्चे का जन्म होने के उपरान्त जब बच्चा उससे ले लिया जाता है, तो नवजात शिशु जहां स्तनपान से वंचित हो जाता है, वहीं उसकी जननी अपने स्तन में उपस्थित दूध व न पिलाने से होने वाले परिणामों के बारे में मानसिक अवसाद का सामना करती है। भारत में कानून की स्थिति इस समस्या के निदान हुेतु अक्षम व लचर है। वर्ष 2002 में सरोगेसी को कानूनी मान्यता प्राप्त हुई।

भारतीय चिकित्सा संगठन (आई.एम.ए.) ने कुछ सिद्धान्त इस हेतु प्रतिपादित किये है, परन्तु इन्हें कानूनी बाध्यता प्राप्त नहीं है। भारत में सम्बंधित पक्षों में जो समझौता होता है, वह वाणिज्यिक समझौते के रूप में होता है, जहां जननी को मात्र देय मुआवजे का उल्लेख होता है। भारत के विधि-आयोग ने इस विषय पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है, परन्तु इस दिशा में प्रगति शून्य है। इसके अतिरिक्त कानून बनने वाला ए.आर.टीबिल 2010 से अभी भी भारतीय संसद में आगे नहीं बढ़ पाया है। इस प्रकार गरीब महिलाएं अभी भी प्रभावी कानूनी प्रावधानों के अभाव में शोषण का शिकार होने को बाध्य है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2008 में बेबी मानसी यमादा बनाम भारत सरकार के प्रकरण में किराये के कोख के बढ़ते औद्यौगिक स्वरूप के कारण गरीब महिलाओं के होते शोषण पर चिंता प्रकट की है। यहाँ यह भी ध्यान देना होगा कि यदि सरोगेसी पर कठोर कानून बनाए गए तो यह धंधा परदे के पीछे चलेगा जहां शोषण ज्यादा होगा व परिणाम भयंकर होंगे।

वर्तमान में भारत में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के द्वारा जारी वर्ष 2005 के दिशा-निर्देश जो अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं, कानून का कार्य कर रहे हैं। भारत में विदेशियों की इच्छा के अनुरूप जवान औरतें कम पैसों में उनके भ्रूण को अपने गर्भ में पालकर जन्म देने को बहुतायत में उपलब्ध हैं। इन महिलाओं के धूम्रपान न करने व शराब न पीने की प्रवृति भी इन विदशी दम्पतियों को आकर्षित करती है। एक अनुमान के अनुसार भारत में किराये की कोख का पर्यटन व्यापार तीन बिलियन डाॅलर प्रतिवर्ष को भी पार कर रहा है। अपनी कोख से दूसरा बच्चा जन्म देते वक्त किराये की कोख वाली महिलाओं को शल्य चिकित्सा से गुजरना पड़ता है। इस प्रकार इन गरीबों को पैसों के लिए अपना पेट कटवाना पड़ता है। भारत में अनुमानतः 25,000 से ज्यादा बच्चों का जन्म किराये की कोख से हो चुका है, जिसमें 50 प्रतिशत से ज्यादा पश्चिमी देशों के हैं। गरीब महिलाएं अपने स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विपरित प्रभावों की चिंता किये बिना लगभग 4000 से 5000 अमेरिकी डाॅलर के बदले पैसों की खातिर अपने गर्भ को किराये पर दे देती है। इस प्रकार बच्चे का जन्म जहंा पति-पत्नी के सन्सर्ग से होना चाहिए, उससे न होकर किसी और के गर्भ से होता है। विडम्बना यह है, कि जन्म देने में सक्षम अमीर महिलाएं स्वयं बच्चे को जन्म ने देकर किराये की कोख की ओर रूख करती हैं, जिससे वह प्रसव पीड़ा से बच सकें या उनके शरीर की सुन्दरता बनी रहे।

भारत में उपलब्ध सस्ती एवं आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं ने किराये की कोख के व्यापार को नया आयाम दिया है। भारत एक तरह से जैविक उपनिवेशवाद के शिकंजे में जकड़ा जा चुका है, तथा प्रजनन पर्यटन केन्द्र के रूप में भी जाना जाने लगा है। गरीबी तथा कमजोर सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण महिलाएं बहुतायत में इस बाजार का हिस्सा बन कर अपनी कोख गुमनाम होकर किराये पर देती हैं, जिससे जन्में बच्चे के जैविक माता-पिता के जीवन में खुशियां आ सकें। सभी पक्षों की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है, कि सभी के हितों की रक्षा हो। समझौता जब बराबरी का होगा, तो सभी के जीवन में खुशियों का आगमन होगा।

इस हेतु यह आवश्यक है कि जो भी लिखित कानूनी समझौता सम्बंधित पक्षों के मध्य होता है, उसमें बच्चे के हितों की पूर्ण रक्षा हो, एवं उसका स्वरूप अधिकारों पर आधारित पहल वाला होना चाहिए। जन्म देने वाली माँ की सेहत का बीमा होना चाहिए, जिससे उसके प्रसव के पश्चात् स्वास्थ्य सम्बन्धी हितों की रक्षा हो सके। सरोगेसी पर स्पष्ट कानून होना चाहिए जिसमें इसके अंतर्गत जन्म देने वाली महिला को मिलने वाले पैसे की कानूनी वैधता का भी उल्लेख होना चाहिए। जो भी समझौता लिखित में किया जाए, उसे बच्चे को जन्म देने वाली माँ को समझाना चाहिए, जिससे भ्रांतियों का निवारण हो सके। कानूनी प्रावधान बनाते समय इस बात का ध्यान रखना अति आवश्यक है, कि ये लागू होने में व्यवहारिक दृष्टिकोण वाले हों, अन्यथा किराये की कोख का व्यापार पर्दे के पीछे गुप्त रूप से होगा, जिसमें इन गरीब महिलाओं का शोषण व्यापक पैमाने पर होगा।

आज के परिदृश्य में भारत में किराये की कोख के व्यापार को रोकना तो संभव नहीं है, परन्तु प्रभावी कानून बनाकर इसे नियंत्रित तो किया जा सकता है। अधिकारों पर आधारित पहल यदि इस दिशा में हुई तो महिलाओं को शोषण से बचाकर उनके मानवाधिकारों की रक्षा की जा सकेगी। हमारे देश की सरकार एवं समाज के समक्ष यह एक चुनौती है, जिसका सामना समग्र प्रयासों से ही किया जा सकता है।


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