Saturday, October 17, 2020

किराये की कोख का बढ़ता व्यापार एवं महिलाएं

 किराये की कोख का बढ़ता व्यापार एवं महिलाएं

21 वीं सदी में तकनीकी विकास तीव्र गति से हुआ है। इस विकास से मानवीय जीवन ही नहीं मानव शरीर भी प्रभावित हुआ है। कृत्रिम अंगों का निर्माण एवं उनका प्रत्यारोपण आज आम होने जा रहा है। इसी प्रकार इस तकनीकी विकास ने उन महिलाओं के लिए भी आशा की किरण जगाई जो मातृत्व-सुख से वंचित थी। समाज में जहां एक ओर जन्म देने वाली माँ को उच्च स्थान प्रदान कर पूजा जाता है, वहीं जन्म देने में असमर्थ महिला को समाज में घृणा व तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। तकनीकी विकास के कारण ऐसी महिलाएं जो मातृत्व सुख से वंचित हैं वे भी किसी दूसरी महिला की कोख का सहारा लेकर आज मातृत्व सुख का आनन्द ले रही हैं।

अमेरिका में आज छात्राएं अपने अंडे प्रजनन हेतु बेच रही हैं। ऐसे-ऐसे कार्टून दिखाई पड़ते हैं जिमनें लिखा गया है कि क्या आप बच्चा पैदा करने जा रहे हैं, अथवा बाहर से निकलवाने का नोटिस देने जा रहे हैं। इस प्रकार किसी वस्तु-निर्माण की तरह बच्चों का निर्माण हो रहा है। विश्व के धनी देशों के लोग कम लागत के कारण बच्चांे की चाह में भारत की ओर रूख कर रहे है। कम लागत व लचर कानून इन विदेशी दम्पतियों के लिये वरदान साबित हो रहा है। किराये की कोख में प्रजनन की ऐसी प्रणाली होती है, जिसमें एक महिला दूसरे के भ्रूण को अपने गर्भ में पालकर जन्म देती है। किराये की कोख से बच्चों का जन्म आज सामान्य सा हो गया है। बच्चों के इस प्रकार जन्म ने मानवाधिकारों के क्षेत्र में एक नयी बहस को जन्म दिया है। ऐसा लगता है किसी कारखाने से उत्पादन हो रहा है। आज इस विषय पर आ रहे विज्ञापनों को पढ़ने से ऐसा लगता है, मानो बच्चा न होकर बाजार का एक उत्पाद हो गया है। इस प्रजनन पर्यटन बाजार का भारत में आज अन्तर्राष्ट्रीयकरण हो गया है।

कानून के जानकारों, समाजशास्त्रियों, चिकित्साविदों, शिक्षाविदों एवं मानवाधिकार वादियों के सम्मुख किराये की कोख के व्यवसायीकरण ने जवलन्त प्रश्न खड़े किये है। यथा-इस प्रकार बच्चों के जन्म से बच्चों एवं उनकी जननी के स्वास्थ्य पर प्रभाव क्या होंगे? विपरित प्रभाव होने पर, उनका समाधान कैसे होगा? इस विधि में दी जाने वाली चिकित्सा/औषधियों के विपरित परिणाम क्या होंगे? इन परिणामों की रोकथाम कैसे होगी? बच्चे को जन्म देने के लिए क्या महिला पर कोई बाहरी दबाव है या वह स्वयं तैयार है? क्या पैसे के लालच में वह दूसरे के बच्चे को जन्म दे रही है? अथवा क्या वह ऐसा अपने पति या सास के दबाव में कर रही है? ऐसा करने से वह महिला सामाजिक जीवन में अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा कर सकेगी? पैसे के लिए यदि महिला अपने शरीर का इस्तेमाल कर रही है तो क्या यह मानवीय गरिमा के अनुकूल है? 

इस प्रणाली द्वारा जन्म देने से क्या उसके प्रजनन अंगों पर विपरित प्रभाव नहीं पड़ेगा? ऐसे में यदि ज्यादा बच्चों का जन्म हो गया तो क्या होगा? बीच में यदि गर्भपात हो गया तो क्या होगा? गर्भस्थ शिशु के जैविक परिजनों की मृत्यु या तलाक हो जाने पर क्या होगा? जन्म के पश्चात उसे जैविक परिजनों को कब दिया जाना चाहिए? यदि जन्मदात्री बच्चा देने से मना कर दे, तो क्या होगा? क्या धनाड्य लोग इससे गरीबों का शोषण नहीं कर रहे? इस प्रकार जन्म देने वाली महिलाएं अधिकांशतः निरक्षर ही क्यों हैं? जैविक माता यदि जन्म देने में सक्षम हों तो क्या दूसरे की कोख का सहारा लेना उचित है? इस प्रकार जन्में बच्चे पर क्या नस्लवादी परिणाम नहीं होंगे? किराये की कोख के बढ़ते व्यापार को कैसे विधि-सम्मत नियंत्रित किया जा सकता है? इस सम्पूर्ण प्रणाली में कानून के प्रावधान कहाँ-कहाँ, किस प्रकार व कैसे लागू होंगे? वर्तमान में कानून की स्थिति क्या है, क्या प्रावधान हैं, क्या होने चाहिए?

भारत में विदेशी लोगों द्वारा किराये पर कोख लेना आम होता जा रहा है। गुजरात का आनंद क्षेत्र जो कि मक्खन के कारण प्रसिद्ध था, आज प्रजनन पर्यटन के कारण विश्व में प्रसिद्ध होता जा रहा है। यहाँ अमेरिका, कनाड़ा व यूरोप के देशों से आवक बढ़ती जा रही है। यह वस्तृवादी व्यवसाय अब आनंद तक ही सीमित नहीं रहा, अपितु भारत के विभिन्न भागों में इसका विस्तार होता जा रहा है। गरीब, लाचार व अनपढ़ महिलाओं को पैसों के लालच में इस व्यवसाय में या तो भागीदार होना पड़ता है या उनके पति/परिजन परिवार की माली हालत सुधारने के लिए बाध्य करते है। इस व्यवसाय में बिचैलियों की चांदी ही चांदी है। जहां वे इन गरीब महिलाओं की कोख से कमाई करते है, वहीं निःसंतान दंपतियों से माल बटोरकर उनका भी शोषण करते है। इस पूरी प्रक्रिया मंे अपनी कोख देने वाली महिला, चिकित्सा केन्द्र कर्मियों व भावी संतान के जैविक परिजनों के बीच एक कानूनी या तथाकथित वस्तुविक्रय रूपी कानूनी समझौते पत्र पर हस्ताक्षर होते है। इस प्रकार तीनों पक्ष सरसरी दृष्टि से कानूनी रूप से इस समझौते की शर्तो का पालन करने को अपने आप को बाध्य करते है।

 बच्चे के जन्म के पश्चात् उसे उसके जैविक माता-पिता को सौंप दिया जाता है, तथा जन्म देने वाली महिला को कोख के किराये का पूरा भुगतान कर दिया जात है। इस प्रकार इस समझौते की शर्ते पूरी हो जाती है। जैसे-जैसे बच्चा पैदा करने की इस प्रक्रिया का चिकित्सा के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीयकरण व बाजारीकरण हुआ है, वैसे-ही-वैसे इसे नियंत्रित करना जटिल होता जा रहा है। किराये की कोख देने वाली महिलाओं को समूह में एक नियत स्थान पर भेड़-बकरी की तरह रखा जाता है। उनकी दिनचर्या निर्धारित होती है। प्रारम्भ में उन्हें कुछ पैसा दिया जाता है। बाकी पैसे का भुगतान प्रसव के बाद किया जाता है। इन महिलाओं का खाना-पीना, चिकित्सा, औषधियां, घूमना-फिरना, सोना सब निर्धारित दिनचर्या के अनुसार होता है। सभी गभर्वती महिलाएं रोजाना एक-एक दिन की गणना कर अपनी रिहाई के दिनों की बाट जोहती है। सप्ताह में किसी नियत दिवस को जेल के कैदियों की भांति अपने निर्धारित निवास-स्थान पर अपने परिजनों से मुलाकात कर सकती है, तथा पैरोल की तरह कभी किसी विशेष प्रयोजन हेतु कुछ दिनों के लिये अपने घर जा सकती है। इन बेबस महिलाओं की मानवीय गरिमा इस प्रक्रिया के मध्य खंडित-विखंडित होती है। इनकी हैसियत एक भू्रण-वाहक मात्र की होती है।


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