Saturday, October 17, 2020

भारत मे स्त्रियॉं की स्थिति

 भारत में स्त्री सदियों से पीड़ित है। उसके साथ माता के गर्भ से लेकर वृद्धावस्था तक भेदभाव किया जाता है। पर इस पर समाज द्वारा कम ही चिन्ता जताई गई है। समाज मान कर चलता है कि ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं नैसर्गिक है। समाज की इस भूल को कानून ने ‘समानता’, ‘जीवन का अधिकार’ की कसौटी पर जांचा-परखा है और सतत कोशिश की है, यह बताती है कि स्त्री भी एक ‘इन्सान’ है और उसके अधिकार पुरुष के बराबर है। भारत की स्वतंत्रता के बाद यहां के संविधान ने स्त्री को तथा वे सभी अधिकार दिए हैं, जिससे उसका सशक्तिकरण तथा विकास हो। संविधान के इन्हीं प्रावधानों के अंतर्गत महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय मिलने की आशा बढ़ी है, उन्हें प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त हुई है। आज भारतीय स्त्री को प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, वकील, चिकित्सक, पायलट न्यायाधीश, बिजनेस टायकून, सभी पदों पर आसीन होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। रोज नए कानूनों का निर्माण हो रहा है-भेदभाव कम हो रहा है। पिछले 25-30 वर्षों में कानून स्त्रियों के पक्ष में आए हैं जिनसे उनका जीवन आसान हुआ है।

यह बदलाव राष्ट्रीय महिला आयोग कानून, 1990 तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कानून, 1993 से ज्यादा परिलक्षित होता है। इस संस्थाओं के आने के बाद महिलाओं से जुड़ी समस्याओं पर ज्यादा गहराई से अध्ययन किया गया, उनका निदान ढूंढा गया तथा लाॅ कमीशन आॅफ इंडिया को महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए, जिनके आलोक में विभिन्न कानून बनें।

भारतीय समाज के कुछ हिस्सों में, जिस तरह एक बेटे की चाह में लोग सदियों से बालिकाओं की हत्या जन्म लेते ही करते हैं। वे लोग गर्भ में ही बालिका शिशु की हत्या करने लगे। यह तकनीक इस हद तक बढ़ी कि गर्भाधान करने के पहले ही ऐसा किया जा सकता है कि सिर्फ बालक शिशु का ही गर्भाधन हो सके, बालिका शिशु गर्भ में आ ही न सके। नतीजा यह हुआ कि भारत के कुछ राज्यों में बालिकाओं की संख्या बालकों से काफी कम हो गई। लिंग के आधार, पर जन्म लेने के पहले ही बालिकाओं के साथ भेद-भाव को देखते हुए कानून मंत्रालय ने प्री-कन्सेप्शन एण्ड प्रीनेरल डायग्नोस्टिक टेक्नीवस (प्रोहिबिशन आॅफ सेक्स सलेक्शन) कानून, 1994 बनाया।

इस कानून के अनुसार धड़ल्ले से चल रहे जेनेटिक काउन्सलिंग सेन्टर्स, जेनेटिक लेबरेटरीज तथा जेनेटिक क्लीनिक्स पर रोक लगाई गई। इन सबको चलाने के लिए इनका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया। रजिस्टेªशन के बाद ही इनका प्रयोग सिर्फ तभी किया जा सकता था, जब भावी माता किसी तरह की ऐसी असमान्यता या बीमारी की शिकार हो, जो बच्चा तथा जच्चा के जीवन के लिए खतरनाक है। इन सब दोषों को पाए जाने के पश्चात् भी 

(1) स्त्री की उम्र 35 वर्ष से ज्यादा हो, 

(2) गर्भवती स्त्री के 2-3 गर्भपात खुद-ब-खुद हो गए हों, 

(3) गर्भवती स्त्री ड्रग्स, रेडियेशन, इन्फेक्शन या केमिकल से प्रभावित हो, 

(4) स्त्री या उसके पति के परिवार का मानसिक रोगी होने का इतिहास हो या और कोई महत्वपूर्ण कारण हो। इसके अलावा गर्भवती स्त्री की लिखित सहमति गर्भपात के लिए हो।

इस कानून के उल्लंघन की सजा तीन वर्ष सश्रम कारावास तक है। इस कानून में 2003 में संशोधन भी लाया गया है, पर इस कानून का अपेक्षित लाभ नगण्य हंै। कारण है-इस कानून को क्रियान्वित करने में किसी की रुचि नहीं है। परिवार, समाज, डाॅक्टर, पुलिस-प्रशासन सभी का ‘माइन्डसेट’ इस मामले में एक जैसा है। सभी बेटे की चाह रखते हैं, बेटी की नहीं। अतः जब भी इस प्रथा की रोक-थाम, कानून को पालन करने की बात आती है, सबकी एक-दूसरे के साथ समानुभूति रहती है। गर्भपात करते वक्त सबसे ज्यादा डाॅक्टर दोषी नजर आते हैं जो कुछ हजार रुपयों के लिए गर्भपात कर देते हैं। वे काफी पढ़े-लिखे समृद्ध है। उन्होंने हर एक की जान बचाने की शपथ खाई होती है-उनके द्वारा इस तरह बालिका भ्रूण हत्या करना शर्मनाक है।

सन् 2005 में स्त्रियों को शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक आर्थिक हिंसा से मुक्त कराने, सुरक्षित रखने का वादा किया।

इस कानून के आने से पहले घर के अंदर स्त्रियों की सुरक्षा का कोई मतलब नहीं था। वे घर के अंदर, घर के लोगों द्वारा प्रताड़ित होने के लिए मजबूर थीं। उन्हें भर पेट खाना नहीं देना, शिक्षा पाने के अवसर नहीं देना, उनके हिस्से की संपत्ति का खुद के लिए उपयोग करना, उन्हें गाली-गलौज, ताने देना, मारना-पीटना या यौन हिंसा तक का प्रयोग करना जैसे आम बात है। यह सब कुछ घर के अंदर की बात है या आपस की बात है, कह कर कोई भी अपराध करना सामान्य सी बात है। पर इस कानून ने इस स्थिति में बदलाव किया है।

इस कानून के अनुसार घर में रहने वाली बच्ची, पत्नी, माँ, बुआ, चाची या लिव-इन-रिलेशनशिप (सहजीवन) में रहने वाली स्त्री यदि किसी भी प्रकार घर के किसी सदस्य द्वारा प्रताड़ित होती है तो वह अदालत की शरण ले सकती है।

इस कानून में पहली बार, पीड़ित स्त्री द्वारा पुलिस या अदालत में न जा पाने की स्थिति में वह ‘सर्विस प्रोवाइडर’ या ‘प्रोटेक्शन आॅफिसर’ को सूचित कर सकती है, जो उसकी कंपलेंट मजिस्टेªट के यहां फाइल कर उसे आर्थिक सहायता, प्रताड़ना से रक्षा, समुचित इलाज, स्त्री-धन प्राप्त करवाना, शिक्षा पाने की सुविधा प्राप्त करना, नौकरी करने की स्वतंत्रता, साथ घर में सुरक्षित रहने या अलग घर लेकर रहने (जिसका खर्च उसको प्रताड़ित करने वाला देगा), हर्जाना दिलवाने आदि का आदेश अदालत से ला कर दे सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया को संपन्न होने में कानूनन 2 महीने लगते हैं तथा तत्काल रिलीफ देने लायक स्थिति में बिना विपक्षी को सुने ही, रिलीफ दी जा सकती है। वैसे तो यह सारी प्रक्रिया ‘दीवानी’ है, पर यदि अदालती आदेश का विपक्षी द्वारा उल्लंघन किया जाता है तो एक वर्ष की सजा का प्रावधान भी है।

इस कानून में समझौता, बीच-बचाव कराने का प्रावधान है। मूल बात है कि परिवार का वातावरण सौहार्दयपूर्ण हो, कोई भेदभाव या मनमानी न हो। पहले यह समझा गया था कि प्रताड़ित करने वाला घर का पुरुष सदस्य ही होगा, पर अब अदालत ने साफ कर दिया है कि घरेलू हिंसा स्त्रियों द्वारा भी की जाती है और उनके विरुद्ध भी मामला चल सकता है।

यह कानून स्त्रियों पर किसी भी प्रकार की हिंसा होने पर त्वरित न्याय दिलाने के लिए बनाया गया, पर यहां भी अदालती कार्यवाही वर्षों चल रही है। इसके अलावा इस कानून का प्रयोग शहरों में हो रहा है, जबकि ग्रामीण समाज, जहां घरेलू हिंसा बड़े पैमाने पर व्याप्त है, वहां इसका प्रयोग नहीं के बराबर है, कानून वहां अदालती इन्फ्रास्ट्रक्चर ही नहीं है।

सन् 2005 में ही हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 आया। इस कानून की धारा-6 के अनुसार स्त्रियों को जन्म के साथ ही, पुश्तैनी संपत्ति पर घर के पुरुषों की तरह उत्तराधिकारी बना दिया गया। पुश्तैनी संपत्ति पर लड़कियों को वही अधिकार मिल गए जो अब तक लड़कों के रहे हैं। भले ही लड़कियों के दायित्व भी लड़के के समान हो गए। 

यह सर्वविदित है कि आज पुरुष का वर्चस्व समाज में है, तो यह उसका संपत्ति पर मालिकाना हक होने की वजह से ही है। धन-संपत्ति से वंचित व्यक्ति वैसे ही काफी कमजोर स्थिति में होता है और यही हालत एक ही घर की संतान होते हुए भी स्त्री की होती है। उसे न चाहते हुए भी पुरुष की गुलाम होने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

पूरे देश में यह संशोधन 2005 में आया पर भारत के कुछ राज्यों, जैसे कर्नाटक में यह संशोधन 30-7-1994 से; आंध्रा में 5-9-1985 से; तमिलनाडु में 25-3-89 से तथा महाराष्ट्र में 22-6-1994 से ही आ गया था। कहना न होगा कि ये राज्य स्त्रियों के मामलों में ज्यादा प्रगतिशील तथा अग्रजी रहते हैं।

पर दुःख के साथ कहना पड़ता है कि पुश्तैनी संपत्ति में बेटी को बेटे के बराबर का अधिकार अभी मात्र कागजों पर ही है। जो भी बेटी इस अधिकार की मांग करती है, उसके सबसे पहले तो, घर से रिश्ते टूट जाते हैं, और कहीं-कहीं उसे मुकदमे सामने हैं जिसमें भाई ने शादी के दिन बहन का कत्ल इसलिए कर दिया कि वह संपत्ति में से अपना हिस्सा मांग रही थी। पुरानी मान्यताओं को मानने वाले लोग कहते हैं-‘पैतृक संपत्ति में से बेटियों को हिस्सा देने की बात ही नहीं उठती। मैंने अपनी संपत्ति अपने भतीजे के नाम एक लिख दी है जिससे कि हमारी संपत्ति हमारे पास रहें।’ एक पंचायत में वहां की दो बेटियों द्वारा संपत्ति के हिस्से को मांगने के लिए अदालत की चैखट लांघना मंहगा पड़ा। उनके घर वाले कहते हैं- ‘‘उन्होंने हमारे घर की इज्जत मिट्टी में मिला दी। पूरे गांव के सामने हमारी आंखें झुक गई है।’’ हर किसी के गांवों में लड़कियों को संपत्ति के नाम पर कुछ दे देना अत्यंत शर्म की बात समझी जाती है। भाइयों के खिलाफ जाकर पैतृक संपत्ति में से हिस्सा मांगना, उनका हिस्सा छीनना, लड़कियों के लिए पूरे समाज में अपनी नाक कटवाने जैसा है।

यहाँ तो खैर अति है, पर भारत के अधिकांश राज्यों में ऐसा कम ही होता है कि अभिभावक अपने-आप बच्चों में बराबरी से संपत्ति का बंटवारा कर दें या मांगने पर चुपचाप, संबंध बिना खराब किए हिस्सा दे दें। कैसे यह कानून काफी अच्छा और स्त्रियों में भेदभाव की स्थिति को लगभग समाप्त कर देने वाला है, पर यह तब तक नहीं होगा जब तक इसका क्रियान्वन न हो। और इसके लिए सरकार को घरेलू हिंसा कानून की तरह ‘सर्विस प्रोवाइडर’ या ‘प्रोटेक्शन आॅफिसरों’ की नियुक्ति करनी होगी जो बेटियों को उनकी संपत्ति के हिस्से के आदेश को अदालत से निर्गत करवा कर घर पर लाकर दे सके।


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