Thursday, October 1, 2020

षिक्षा लोकतंत्र की सफलता और आर्थिक विकास का मूल मंत्र ह

 षिक्षा लोकतंत्र की सफलता और आर्थिक विकास का मूल मंत्र 

लोकसभा अध्यक्ष माननीया मीरा कुमार ने आज यहां काषी हिन्दू विष्वविद्यालय के 94 वें दीक्षांत समारोह में कहा कि षिक्षा हमारे लोकतंत्र की सफलता और आर्थिक विकास का मूल मंत्र है।

काषी हिन्दू विष्वविद्यालय के 94 वें दीक्षांत समारोह मंे मुख्य अतिथि मीरा कुमार ने कहा कि वस्तुतः षिक्षा जन्म से ही प्रारम्भ हो जाती है और जीवन पर्यन्त चलती है यह केवल किताबी ज्ञान नहीं बल्कि जीवन की विकट चुनौतियों का सामना और समाधान करने के लिए खुद को तैयार करने का साधन भी है। षिक्षा आर्थिक विकास की आधार षिला भी है। विगत दो षताब्दियों मंे वैज्ञानिक षोधांे के आधार पर कई क्रांतियां आयी हैं और औद्योगिक एवं हरित क्रांति से औद्योगिक तथा कृशि उत्पादन कई गुना बढ़ा है। सूचना और प्रौद्योगिकी क्रांति ने विष्व के सभी लोगांे को एक दूसरे के निकट ला दिया है। षिक्षा हमारी लोकतंत्र की सफलता का मूल मंत्र है जिसके कारण लोकतंत्र सबको बराबरी का अधिकार प्रदान करता है।

उन्हांेने कहा कि हमारी आधी से ज्यादा श्रम षक्ति कृशि में लगी है जो षिक्षा जगत के लिए चिन्ता का विशय है लेकिन कृशि करने वाले अधिकांष लोग अभी भी निरक्षर और विपन्न हैं। क्शि करने वाला तो हमंे अन्न देता है पर हम उन्हें क्या देते हैं यह षोचनीय है। हमारी साक्षरता दर में सुधार हुआ है, 1951 में हमारी साक्षरता जहां 18 प्रतिषत के लगभग थी वहीं यह आज 74 प्रतिषत हो गयी है। निःसंदेह षिक्षा के क्षेत्र में अध्यापकों की भूमिका महत्वपूर्ण है इसलिए भारतीय परम्परा में अध्यापकों का स्थान अत्यन्त श्रद्धापूर्ण रहा है। अध्यापक ही है जो विद्यार्थियों को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करने तथा उन्हें नैतिकता और सदाचार के गुणों से सम्पन्न करने का गुरूतर दायित्व निभाते हंै।

उन्होंने कहा कि महामना ने काषी हिन्दू विष्वविद्यालय की स्थापना के लिए काषी को ही क्यांे चुना, वस्तुतः काषी प्राचीन भारतीय गुरूकुल परम्परा, संस्कृत वांग्मय और वैदिक ज्ञान विज्ञान के अध्ययन और अध्यापन का केन्द्र रही है। गुप्त काल में काषी का उत्कर्श चरम पर पहुंचा और तब से आधुनिक काल तक निरन्तर उसके गौरव गरिमा की श्रीवृद्धि होती गयी है। धार्मिक सांस्कृतिक रूढ़ियांे के भन्जक गौतम बुद्ध, गुरू रविदास, संत कबीर, संत ज्ञानेष्वर और स्वामी विवेकानन्द के प्रेरणाप्रद जीवन से काषी निकट से जुड़ी है। भारतेन्दु हरिष्चन्द्र, जयषंकर प्रसाद, प्रेमचन्द्र, डा भगवान दास और पंडित गोपीनाथ कविराज काषी की ही विभूति थे। अंग्रेज प्रभुआंे को चुनौति देने वाले काषीराज महाराज चेतसिंह भी काषी की पुण्य भूमि की ही उपज थे। इस ऐतिहासिक परिवेष और भारतीय सभ्यता के नाभि कंेन्द्र को महामना ने इसी कारण काषी हिन्दू विष्वविद्यालय की स्थापना के लिए चुना था।

उन्होंने कहा कि जिस पुण्यसलिला गंगा के कारण काषी और इस विष्वविद्यालय की पहचान है उसकी अधोगति मुझे अत्यन्त मर्माहत करती है, क्या हम उसे निर्मल बना कर उसकी पुनः प्रतिश्ठा करने का संकल्प नहीं ले सकते। यह काषी की गरिमा को यथावत बनाये रखने के लिए नितांत आवष्यक है।

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