Saturday, October 3, 2020

21वीं सदी में भारत की विदेश नीति

 21वीं सदी में भारत की विदेश नीति

जैसा कि वैश्विक परिदृश्य में निरंतर बदलाव देखने को मिल रहे हैं, ऐसे में भारत अपने कूटनीति संबंधों में नए अध्याय जोड़ रहा है। इस बारे में बता रहे हैं पूर्व राजदूत अनिल वाधवा

अपने पड़ोसी देषों तथा दुनिया भर से सहयोग बढ़ाने में कारगर माहौल बनाना ही 21वीं सदी में भारत की विदेष नीति का मुख्य ध्येय तथा कारक रहा है। इसके चलते देष की अर्थव्यवस्था में विकास संभव होगा, सामाजिक उत्थान होगा तथा उसकी साॅफ्ट पावर फलेगी-फूलेगी। 133 करोड़ की जनसंख्या वाला यह देष, विष्व के अन्य देषों की जमात में उचित स्थान पा सकेगा। लगभग तीन दषकों तक हुए सुधारों तथा खुले बाज़ार के कारण, निस्संदेह भारत अपनी सुरक्षा के लिए नई चुनौतियांे का सामना कर रहा है। इसके त्वरित परिवर्तन के लिए पूंजी, प्रौद्योगिकी, विचारों और नवाचार के प्रवाह में वृद्धि की आवष्यकता है। व्यापार के स्तर में वृद्धि, श्रम एवं प्रौद्योगिकी के प्रवाह को बढ़ाने के एवज़ में इससे जुड़े देष यह मानते हैं कि भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने की आवष्यकता है। विकास के लिए महŸवपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों का अधिग्रहण करना ज़रूरी है। एक दूसरे से संपर्क के लिए भारत अपने समुद्री गलियारे खुले रखे। विदेषों में कारोबार एवं निवेष के अवसरों की तलाष करे, साथ ही अंतरराश्ट्रीय कंपनियों के लिए अपना बाज़ार खुला रखे। नियम आधारित आदेष को सुरक्षित करने, उदारीकृत व्यापार और निवेष षासन के लिए बहुपक्षीय संस्थानों के माध्यम से काम करे।

जून 2019 में बिष्केक में आयोजित षंघाई सहयोग संगठन के षिखर सम्मेलन में अन्य नेताओं के साथ बैठे भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ‘पहली पंक्ति बाएं से तीसरे’

गत दषक में दुनिया भर के देषों ने इसके चरित्र में बदलाव देखा अर्थात भारत में एकमात्र महाषक्ति का प्रभुत्व देखने को मिला। अंतरराश्ट्रीय प्रणाली में षक्ति के एक नए वितरण से जहां अमेरिका को   चुनौतियों का सामना करना पड़ा, वहीं चीन भी अमेरिकी प्रभुत्व के समक्ष एक चुनौती बनकर उभरा। संघर्श के नए क्षेत्र प्रौद्योगिकी प्रभुत्व और आर्टिफिषियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट, मषीनों का   ज्ञान एवं रोबोटिक षक्तियों पर तेज़ी से विकसित होने की क्षमता पर आधारित हैं। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन, खाद्य को लेकर असुरक्षा एवं मानव विकास में बाधक आतंकवाद के बढ़ते ख़तरे को लेकर भी   विवाद उत्पन्न हुए।

भारत का हमेषा से ही विषेश ध्यान अपने पड़ोसियों पर रहा है। वह चाहता है कि सतत विकास के लिए आपसी सद्भाव एवं स्थिरता बनी रहे। भारत की विदेष नीति में दक्षिण एषिया का विषेश स्थान रहा है। श्रीलंका, बांग्लादेष, भूटान, नेपाल, म्यांमार, मालदीव तथा पाकिस्तान के साथ अच्छे एवं सुदृढ़ संबंध बनाने के लिए भारत इसी दिषा में काम कर रहा है। भारत इन देषों के अलावा चीन के साथ भी आपसी संबंध सुधारने के लिए संतुलन बनाकर चल रहा है। द्विपक्षीय मंच पर भारत ने चीन के साथ डोकलाम मुद्दा नहीं उठाया। गत वर्श दोनों देषों के नेताओं के बीच हुए षिखर सम्मेलन में इस बात पर बल दिया गया कि भविश्य में भी सहयोग की भावना के साथ कार्य किया जाए।

पिछले कुछ वर्शों में आसियान ‘दक्षिण पूर्व एषियाई राश्ट्र संघ’ देषों के साथ संबंधों में नवीनता देखने को मिली है। इन देषों के नागरिकों के साथ प्रत्यक्ष, डिजिटल एवं सांस्कृतिक रूप से संपर्क बढ़ाने पर बल दिया गया है। सिंगापुर, वियतनाम, मलेषिया, इंडोनेषिया एवं फिलिपींस के साथ भारत द्वारा किए गए रक्षा समझौतों में उल्लेखनीय प्रगति देखने को मिली। इंडो-पेसिफिक संदर्भ में विकास देखने को मिला। अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया एवं भारत जैसे लोकतांत्रिक देषों के समूह ‘क्वाड’ का महŸव बढ़ा। ये समान विचारों वाले देष चाहते हैं कि विष्व में विधि का षासन कायम रहे, दिक्चालन एवं वायुमार्ग के उपयोग की स्वतंत्रता बरकरार रहे तथा क्षेत्र में षांति और स्थिरता बनी रहे। भारत के लिए इंडो-पेसिफिक संदर्भ आसियान से भिन्न है। उसके लिए यह संदर्भ विषेश महŸव रखता है, जिसमें उल्लेख किया गया है कि किसी एक देष के लिए अन्य देष के हितों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। यद्यपि आसियान इस संदर्भ का मुख्य केंद्र रहा है। सदस्य देषों को यह व्यवस्था करनी चाहिए कि क्षेत्र में विकास और समृद्धि का वातावरण बना रहे। भारत के आसियान देषों के साथ संबंध लगातार विकसित होते रहे हैं तथा स्थाई बने हैं। भारत सदस्य देषों के साथ समुद्री मार्गों के उपयोग की दिषा में सहयोग करता रहा है। आसियान देषों के अलावा भारत वर्तमान में चीन, आॅस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, जापान एवं दक्षिण कोरिया के साथ क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक सहयोग साझेदारी ‘आरसीईपी’ संधि पर कार्य कर रहा है। अगर यह संधि सफल हो जाती है तो निष्चित रूप से क्षेत्र में आषातीत विकास होगा और यहां की तस्वीर ही बदल जाएगी।

अप्रैल 2019 में नई दिल्ली में आयोजित 21वीं आसियान-भारत के वरिश्ठ अधिकारियों की बैठक ‘एसओएम’ में उपस्थित प्रतिभागी’

भारत-अफ्रीका सहयोग भी सही दिषा में अग्रसर हो रहा है तथा इसने नई ऊंचाइयों को छुआ है। ये संबंध भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा सुझाए गए 10 दिषा-निर्देषों पर आधारित हैं। भारत आपसी संबंधों को सुदृढ़ बनाने का दायरा अपने पष्चिम में स्थित पड़ोसी देषों तक फैलाना चाहता है। भारत ऊर्जा की मांग को पूरा करने के लिए खाड़ी देषों से संबंध मज़बूत बना रहा है। वहां रह रहे 70 लाख प्रवासी भारतीय कामकाज करके उनकी अर्थव्यवस्था में अहम योगदान दे रहे हैं। उनके साथ कारोबार, निवेष एवं सुरक्षा संबंधित समझौते किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर इन सभी में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। भारत इस क्षेत्र में स्थिरता चाहता है, इसलिए अमेरिका व ईरान में संघर्श बढ़ने से वह चिंतित है क्योंकि इससे ऊर्जा सुरक्षा एवं मध्य एषियाई देषों से संपर्कता प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होगी।

अपनी परिधि से परे, भारत ने अन्य देषों से भी अपने संबंध सुदृढ़ बनाए हैं जिसकी षुरुआत मध्य एषिया के देषों से हो चुकी है। भारत अब तो षंघाई सहयोग संगठन ‘एससीओ’ में भी सक्रिय रूप से भागीदारी निभा रहा है। भारत आर्थिक दिषा में सहयोग बढ़ाने के लिए यूरेषियन समुदाय के साथ भी समझौते कर रहा है। यूरोप में भी भारत के जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, इटली, ब्रिटेन आदि देषों से गहरे आपसी संबंध रहे हैं। लेटिन अमेरिका के साथ भी भारत का कारोबार एवं निवेष फल-फूल रहा है। प्राकृतिक संसाधन नया क्षेत्र बन गया है, जिसमें सहयोग बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है। रूस निरंतर हमारा विष्वसनीय एवं लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में सहयोगी रहा है। किंतु दोनों देष चाहते हैं कि अन्य नए क्षेत्रों को भी खोजा जाए ताकि आर्थिक सहयोग बढ़ाया जा सके। इस दिषा में गत वर्श सोची षिखर सम्मेलन हुआ था। इस्राइल, दक्षिण कोरिया एवं आॅस्ट्रेलिया के साथ भी आपसी संबंधों को बढ़ाया गया है। अमेरिका के साथ भारत के संबंध बहु-वर्णीय चरित्र को परिलक्षित करते हैं। रक्षा, विज्ञान एवं तकनीक, लोगों का लोगों से संपर्क के साथ-साथ कारोबार व निवेष के क्षेत्र भी दोनों देषों के आपसी संबंधों के अहम स्तंभ बन गए हैं।

बहुपक्षीय क्षेत्र में, भारत का निरंतर प्रयास है कि उसे संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद में स्थाई सदस्यता मिले। भारत इसका हकदार भी है क्योंकि उसने षांति बनाए रखने के अनेक अभियानों में महŸवपूर्ण भूमिका निभाई है। अपनी विषाल आबादी के कारण अंतरराश्ट्रीय षांति एवं सुरक्षा के किसी भी मसले को वह रिकाॅर्ड समर्थन दे सकता है।

जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे उठाने, अक्षय ऊर्जा तथा सौर ऊर्जा अपनाने जैसे मामलों में भारत एक विजेता के रूप में उभरा है। संबंधित क्षेत्र में समुद्री अर्थव्यवस्था के विकास की दिषा में भारत क्षेत्रीय संगठनों जैसे हिंद महासागर रिम संगठन ‘आईओआरए’ के साथ मिलकर कार्य कर रहा है। भारत ने हमेषा से ही आतंकवाद के उन्मूलन के मुद्दे को वैष्विक स्तर पर ज़ोर-षोर से उठाया है। भले ही वह संयुक्त राश्ट्र, अंतरराश्ट्रीय विŸा संस्थान अथवा जी20 हो, भारत वैष्विक षासन में सुधार के मुद्दे पर सदा ही अग्रणीय रहा है। अंतिम विष्लेशण में, भारत की विदेष नीति को उसके घरेलू क्षेत्रों की आवष्यकता के अनुरूप आकार दिया जा रहा है। देष में विकास, आर्थिक एवं वैज्ञानिक उन्नति के लिए तकनीक तथा पूंजी लाने से संबंधित कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।


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