Saturday, October 17, 2020

हिन्दू एडाॅप्शन एण्ड मेन्टेनेन्स एक्ट, 1956

 हिन्दू एडाॅप्शन एण्ड मेन्टेनेन्स एक्ट, 1956 के अनुसार पहले पति बच्चे को गोद ले सकता था और उसे इसके लिए पत्नी की सहमति लेनी पड़ती थी। पर पत्नी, पति के जिन्दा रहते बच्चा गोद नहीं ले सकती थी। यह प्रावधान पत्नी को पति के सामने समानता का अधिकार नहीं देता था। पर इस असमानता को एडाॅप्शन एक्ट की धारा-8 ने 31-8-2010 से समाप्त कर दिया। अब पत्नी भी अपने पति की सहमति से बच्चा गोद ले सकती है। उस पर भी वे ही अन्य शर्तें लागू होगी जो एक पति पर लागू होती है।

वैसे एक गैर शादीशुदा, तलाकशुदा, विधवा, जिसके पति ने सन्यास ले लिया हो या जिसे सक्षम अदालत द्वारा पागल घोषित कर दिया गया हो, जो स्वस्थ मस्तिष्क की हो, बालिग हो, पहले भी बच्चा गोद ले सकती थी। इस ग्रुप में वह स्त्री शामिल नहीं थी जो शादीशुदा है और जिसका पति जीवित हैं अब यह बाधा दूर हो गई है- जो स्त्री को एक अतिरिक्त सम्मान तथा हिम्मत प्रदान करती है।

इसी प्रकार पहले पिता अकेला ही अपने बच्चे को गोद ले सकता था, पत्नी की सहमति आवश्यक नहीं थी, पर अब उसे पत्नी की सहमति, बच्चा गोद देने के पहले होगी। हिन्दू मैरिज एक्ट, 1955 में 24-9-2001 से संशोधन लाकर एक महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़ा गया है। इसके अनुसार किसी भी प्रकार की अदालती कार्यवाही, जो इस कानून से संबंधित है, के अंतर्गत यदि अदालत को यह लगता है कि पत्नी के पास कोई आय का स्रोत नहीं है तो वह मुकदमे का खर्च तथा भरण-पोषण की मांग किए जाने पर, प्रतिपक्षी को नोटिस मिलने के बाद से 60 दिनों के अंदर पत्नी को प्रतिपक्षी से खर्च दिलवाएगी।

(वैसे यह प्रावधान पत्नी के आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने तथा पति को आर्थिक रूप से बदहाल होने पर, पत्नी पर भी लागू होता है।)

यह एक ऐसा प्रावधान है जिसका लाभ अक्सर पत्नियों को प्राप्त होता है। खर्च मिलने पर पत्नी भी अपना मुकदमा अच्छी तरह लड़ सकती हैं। ऐसा न होने पर एक तरफा फैसला होना आम बात हो जाती है। इस प्रावधान पर कर्नाटक उच्च न्यायालय का फैसला भी है-आर. सुरेश बनाम चन्द्रा एम.ए.-ए.आई.आर. 2003, कर्नाटक 183. संयुक्त परिवारों के टूट जाने पर भारत में वृद्धों का जीवन अत्यन्त कठिन हो गया है, खास कर विधवाओं का जीवन। उन्हें अपना जीवन अकेले, बिना किसी भावनात्मक सहारे के और अक्सर बिना पैसे के गुजारना पड़ता है। इसी वजह से आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा-125 के रहने के बावजूद सरकार को 2007 में ‘मेन्टेनेन्स एण्ड वेलफेयर आॅफ पेटेन्टस एण्ड सीनियर सिटिजन्स एक्ट’ लाना पड़ा। इस कानून की वहज से अब माता-पिता तथा सीनियर सिटिजन उन लोगों से (जिन्हें उनकी संपत्ति मरणोपरान्त प्राप्त होगी)- बच्चों से भरण-पोषण, दवा, सिर पर एक छत की मांग अदालत द्वारा कर सकते हैं। ये सीनियर सिटिजन वे हैं, जिनके पास धन तो है पर जिनके बच्चे नहीं हैं-दूर-दराज के वे रिश्तेदार हैं जिनके पास उनकी संपत्ति मरणोपरान्त चली जाएगी। यह तो स्थिति उनकी है जिनकी धरोहर बच्चों और रिश्तेदारों को जानी है, पर यदि ऐसा नहीं है, तब भी जिनके पास संपत्ति नहीं है, वे राज्य से अपनी देख-रेख की मांग कर सकते हैं।

यह कानून सन् 2008 से लागू हुआ है। इसके अनुसार ‘बच्चे’ वे हैं, जो वृद्धों के पुत्र-पुत्री, पोता-पोती हैं, पर इनमें नाबालिक बच्चे शामिल नहीं हैं। यहां भरण-पोषण का अर्थ है-भोजन, कपड़े, घर, चिकित्सा आदि। माता-पिता का अर्थ है-माता-पिता, जैविक, गोद लेने वाले, सौतेले पिता या सौतेली माता-भले ही माता-पिता वृद्ध न हो। ‘सीनियर सिटिजन’ का अर्थ है, वह जिसकी आयु 60 वर्ष या उससे ज्यादा है। ‘रिश्तेदार’ का अर्थ है-जिसके खुद के बच्चे नहीं हैं, पर जिसकी संपत्ति, उसकी मृत्यु के बाद वारिसों के पास चली जाएगी।

ऐसे वृद्ध जिन्हें भरण-पोषण की जरूरत हैं, वे ‘मेन्टेनेन्स ट्रिब्यूनल’ के पास खुद शिकायत पत्र डाल सकते हैं। यदि वे जाने में असक्षम हैं तो किसी और व्यक्ति को या किसी संस्था को अधिकार पत्र दे कर शिकायत पत्र डलवा सकते हैं या ट्रिब्यूनल खुद ही शिकायत दर्ज कर सकती है, यदि उसे किसी माध्यम से पता चले कि कोई वृद्ध या वृद्धा अभावों में जी रही है।

ट्रिब्यूनल प्रतिपक्षी को नोटिस मिलने के 90 दिनों के अंदर, मामले की जांच कर भरण-पोषण का अधिकार दिलवा सकती है।

यदि आदेश के बावजूद बच्चे या रिश्तेदार आदेश का पालन नहीं करते हैं तो प्रतिपक्षी के विरुद्ध वारण्ट निर्गत किया जा सकता है और उसे भरण-पोषण देने के लिए बाध्य किया जा सकता हैं।

इसके अलावा जिनका कोई नहीं है, उनके लिए राज्य सरकारें वृद्धाश्रम बनायेगी। ऐसे आश्रमों को हर जिले में बनाने की योजना है, जहां कम-से-कम 150 वृद्धों को रखा जा सकेगा। ऐसे लोगों को सरकारी अस्पतालों में रख कर इलाज करवाने का प्रावधान है। उनके लिए अलग लाईन लगने आदि की व्यवस्था का प्रावधान भी है। 

इस कानून की जानकारी अब लोगों को हो रही हैं, पर आज भी भारत में वृद्ध माता-पिता बच्चों के खिलाफ मुकदमा करने में हिचकिचाते हैं। वे कहते हैं कि अपने ही बच्चों के खिलाफ कैसे वारण्ट निकलवाएं। वैसे अदालतें ऐसे लाचार लोगों की पूरी मदद देने में तत्पर रहती हैं। एक माँ, दादी को जिंदगी की शाम अच्छी तरह बिताने की व्यवस्था कर सरकार ने एक महत्वपूर्ण कानून दिया है। आशा की जाती है कि मथुरा, वृन्दावन, ऋषिकेष, हरिद्वार जहां वृद्ध माताओं, दादियों को हजारों की संख्या में भिखमंगों की तरह जीवन व्यतीत करना होता है, राज्य सरकारें अविलंब वृद्धाश्रम तथा अस्पताल की सुविधाएं देंगी। सन् 2006 में चाइल्ड मैरिज रेस्टेªक्ट एक्ट आया। यह कानून सबसे पहले 1929 में लाया गया था। उस समय भारत की गुलामी का समय था। ज्यादातर बच्चों के विवाह दूध पीते उम्र में ही हो जाता था। ऐसे विवाहों को धार्मिक स्वीकृति प्राप्त थी, पर इसके कुपरिणाम भी देखने में आते थे। छोटी सी उम्र में ‘विधवा’ होकर बड़ी कठिन परिस्थितियों में लड़कियाँ अपना जीवन गुजारने पर मजबूर थीं। विवाह का यह स्वरूप ब्रिटेन में कभी नहीं रहा। इसके बाद इस कानून का संशोधित रूप 1949 में तथा फिर 1978 में आया। इन कानूनों के सहारे धीरे-धीरे विवाह की उम्र बढ़ाई गई।

पर जिस मात्रा में बाल विवाहों को रोका जाना था, वैसा 1978 के कानून से नहीं हो पाया। इसीलिए 2006 में बाल विवाह कानून में और भी संशोधन किए गए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2001-2002 में कुछ सुझाव दिए, जो उसकी गहन सोच और अध्ययन पर आधारित हैं। केंद्रीय सरकार ने राज्य सरकारों, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राष्ट्रीय महिला आयोग की सभी अनुशंसाओं को मान लिया तथा नया कानून दिया।

इस कानून के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु निम्नलिखित हैं:-

(1) यदि बाल विवाह हो जाता है, चाहे इस कानून के आने के पहले या बाद में, तो ऐसा विवाह उस पक्ष के चहने पर निरस्त करवाया जा सकता है जो विवाह के समय बालक था। पर इस मामले में किसी स्त्री को सजा नहीं होगी। बाल विवाह को बढ़ावा देने वाले तथा बाल विवाह करवाने वाले व्यक्ति को 2 वर्ष तक की सजा तथा 1 लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है। (धारा-3)

(2) बाल विवाह के निरस्त हो जाने पर बालिका वधू का पालन-पोषण भत्ता उसके पूर्व पति (यदि वह बालिग है) को देना होगा जब तक कि बालिका वधू का पुनर्विवाह नहीं होता और यदि पूर्व पति नाबालिग है तो यह भार पूर्व पति के पिता या अभिभावक को उठाना होगा। पूर्व बालिका वधू को कितना भत्ता मिलेगा इसका निर्णय जिला अदालत करेगी। इसके साथ पूर्व बालिका वधू इस कालावधि में कहां रहेगी- यानी घर-इसका निर्णय भी अदालत करेगी। (धारा-4)

(3) इस प्रकार यदि बाल विवाह के फलस्वरूप किसी बच्चे का जन्म हो जाता है तो यह बच्चा कहाँ रहेगा- किसके पास रहेगा, इसका निर्णय भी जिला अदालत करेगी। यह निर्णय जिला अदालत द्वारा लिया जाएगा और इसमें बच्चे की अच्छी परवरिश, उसका कल्याण ही वह बिन्दु होगा जिस पर पर बच्चे की ‘कस्टडी’ का निर्णय होगा। (धारा- 5)

(4) बाल विवाह के परिणामस्वरूप हुए बच्चे, भले ही इस कानून से पहले या बाद में या तो गर्भ में आए या जन्म हुआ-पति-पत्नी का विवाह-बाल विवाह होने की वजह से निरस्त होने के बावजूद-बच्चों के कानूनन वैध होने पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगेगा। वे हर हालत में अपने माता-पिता की वैध सन्तान ही कहलाएंगे।


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